पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और सीपीएम के बीच प्रस्तावित चुनावी तालमेल की राह में दो सीटें -रायगंज और मुर्शिदाबाद- सबसे बड़ी बाधा बनी हुई हैं. पिछली बार ये दोनों सीटें सीपीएम ने जीती थीं. लेकिन इनको कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है.
अब कांग्रेस इन सीटों पर दावा कर रही है तो सीपीएम भी इनको छोड़ने को तैयार नहीं है. सीपीएम ने तो इन सीटों पर अपने उम्मीदवारों का एलान भी कर दिया है.
इससे तालमेल का मुद्दा उलझता जा रहा है. वैसे, इस तालमेल के मुद्दे पर दोनों दलों को अपने अंतर्विरोधों से भी जूझना पड़ रहा है. लेफ्ट फ्रंट के घटक दलों के अलावा सीपीएम का एक गुट भी कांग्रेस से तालमेल के खिलाफ है तो दूसरी ओर कांग्रेस का एक गुट भी अकेले मैदान में उतरने के पक्ष में है.
इन दोनों दलों के बीच लंबे समय से चुनावी तालमेल की बातचीत चल रही थी. लेकिन दो सीटों पर मामला उलझने की वजह से अब तक यह बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है.
इसबीच, शायद कांग्रेस पर दबाव बढ़ाने की मंशा से ही सीपीएम ने उन दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवारों का एलान भी कर दिया है. इससे पहले सीपीएम की बैठक के बाद प्रदेश महासचिव सूर्यकांत मिश्र ने साफ़ कर दिया था कि पिछली बार जीती गई कांग्रेस की चार और सीपीएम की दो सीटों पर कोई दोस्ताना लड़ाई नहीं होगी.
दरअसल, सीपीएम ने पिछली बार जो दो सीटें—रायगंज और मुर्शिदाबाद जीती थीं, उनको लंबे अरसे से कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. रायगंज सीट पर पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रियरंजन दास मुंशी जीतते रहे थे और उसके बाद वर्ष 2009 में उकी पत्नी दीपा दासमुंशी ने यह सीट जीती थी. लेकिन वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के कांग्रेस के वोट बैंक में मजबूत सेंध लगाने की वजह से चौतरफ़ा लड़ाई में सीपीएम के मोहम्मद सलीम महज 16 सौ से कुछ ज्यादा ज्यादा वोटों के अंतर से यह सीट जीत गए थे.
पिछली बार रायगंज सीट पर मोहम्मद सलीम को जहां 29 फ़ीसदी वोट मिले थे वहीं कांग्रेस की दीपा दासमुंशी को 28.50 फ़ीसदी. लेकिन बीजेपी का वोट वर्ष 2009 के 4.19 फीसदी के मुकाबले चार गुने से ज़्यादा बढ़ कर 18.32 फ़ीसदी तक पहुंच गया. यही कांग्रेस की हार की मुख्य वजह बनी. लेकिन अबकी कांग्रेस इन दोनों सीटों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
दूसरी ओर, सीपीएम ने भी साफ़ कर दिया है कि वह इन सीटों पर कोई समझौता नहीं करेगी. लेफ्ट फ्रंट के चेयरमैन विमान बसु कहते हैं, "हमने उन दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम का एलान कर दिया है. हम उन चार सीटों पर अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेंगे जो पिछली बार कांग्रेस ने जीती थीं." लेकिन क्या इससे तालमेल में रुकावट नहीं आएगी? इस सवाल पर बसु का कहना है कि पिछली बार जीती सीटों के अलावा बाकी सीटों को लेकर तालमेल की संभावना बनी हुई है.
दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस ने भी इन दोनों सीटों की रट लगा रखी है. प्रदेश अध्यक्ष सोमेन मित्र ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को एक पत्र भेज कर इस मुद्दे पर सीपीएम के केंद्रीय नेतृत्व से बात करने का अनुरोध किया है. उन्होंने हाल में दिल्ली जाकर राहुल से मुलाकात भी की थी. कांग्रेस की दलील है कि वर्ष 2014 में मुकाबला चौतरफ़ा होने की वजह से उसके उम्मीदवार बहुत कम अंतर से पराजित हुए थे. लेकिन अबकी पार्टी को वहां जीत का पूरा भरोसा है.
मित्र कहते हैं, "मैंने आलाकामन को ज़मीनी हक़ीक़त और पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं की इच्छा से अवगत करा दिया है. अब फ़ैसला उनको लेना है." वह कहते हैं कि राज्य के ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता अपने गढ़ रहे रायगंज और मुर्शिदाबाद सीटों पर चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं.
मित्र कहते हैं, "हम नहीं चाहते कि सीपीएम के साथ तालमेल मौकापरस्ती लगे. हम दीर्घकालीन तालमेल चाहते हैं जो कम से कम अगले विधानसभा चुनावों तक जारी रहे." उनका कहना है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस अकेले ही लोकसभा चुनाव लड़ेगी. वरिष्ठ कांग्रेसी और विधानसभा में विपक्ष के नेता अब्दुल मन्नान कहते हैं, "बीजेपी की बढ़त रोकने के लिए सीपीएम के साथ तालमेल जरूरी है. लेकिन इसके लिए रायगंज और मुर्शिदाबाद जैसी कांग्रेस गढ़ की क़ुर्बानी नहीं दी जा सकती."
वैसे, इन दोनों दलों के बीच वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में भी तालमेल हुआ था. लेकिन उससे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ था. तब लेफ्ट को महज 32 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 44 सीटें.
लेफ्ट के घटक दल भी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने को लेकर आशंकित हैं. उनकी दलील है कि बीते महीने ब्रिगेड रैली में लेफ्ट की रैली में जुटने वाली भीड़ से साफ है कि पार्टी का जनाधार मज़बूत हो रहा है. ऐसे में उसे किसी बैसाखी का सहारा लेने की ज़रूरत नहीं है.
आरएसपी महासचिव क्षिति गोस्वामी कहते हैं, "हम अकेले ही बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. हमें कांग्रेस के सहारे की ज़रूरत नहीं है." फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के प्रदेश सचिव नरेन चटर्जी कहते हैं, "वर्ष 2016 में हुए तालमेल से कांग्रेस को ही फ़ायदा हुआ था. ऐसे में वही ग़लती दोहराने का कोई मतलब नहीं है."
Wednesday, March 13, 2019
Friday, February 15, 2019
पुलवामा हमले को कश्मीर के लिए ख़तरनाक संकेत मान रहे विशेषज्ञ
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सीआरपीएफ़ के काफ़िले पर गुरुवार को हुए हमले में 34 जवान मारे गए हैं और कई घायल हुए हैं.
पुलवामा ज़िले के लेथपोरा में आईईडी धमाके के ज़रिये 40 से ज़्याद जवानों से भरी एक बस को निशाना बनाया गया.
कश्मीर में रक्षा विशेषज्ञ सुरक्षा बलों पर हुए इस हमले को भारत सरकार की पूरी नाकामी बता रहे हैं.
पूर्व पुलिस उप-महानिदेशक और लेखक अली मोहम्मद वटाली ने कहा, "इस तरह के हमलों से यह संदेश निकलकर आता है कि चरमपंथियों को मारने की नीति नाकाम रही है. इस तरह का हमला समस्या को जटिल करता है."
मोहम्मद वटाली ने कहा, "भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कई बार कहा कि कुछ महीनों में कश्मीर में चरमपंथी ख़त्म हो जाएंगे. मगर उनकी बात सही साबित नहीं हुई. कश्मीर में स्थिति ख़राब होती जा रही है. सेना को इस्तेमाल करने का विकल्प इसे संभालने में नाकाम रहा है. कश्मीर में हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते."
मोहम्मद वटाली से जब पूछा गया कि पिछले कुछ सालों में तो चरमपंथी आत्मघाती या फ़िदायीन हमले नहीं करते थे, तो उन्होंने कहा, "यही तो मैं बता रहा हूं. एक समय ऐसा था जब इस तरह के हमले होना आम बात हो गई थी. मगर हम एक बार फिर उसी दौर में प्रवेश कर रहे हैं जब ऐसे हमले हो रहे हैं."
पूर्व पुलिस महानिदेशक एम.एम. खजूरिया कहते हैं कि कश्मीर में जो चल रहा है, वो ऐसी लड़ाई नहीं है जो एक-दो महीनों में ख़त्म हो जाए. वह मानते हैं कि ये एक लंबा संघर्ष है.
खजूरिया कहते हैं, "ये लड़ाई महीनों में ख़त्म नहीं हो सकती. जबसे इसमें वहाबी (मुस्लिमों का एक वर्ग जिनकी संख्या सऊदी अरब में ज़्यादा है) फ़ैक्टर जुड़ा है, नया खेल शुरू हो गया है. आज जो हुआ, वो एक बड़ा हमला था. दूसरी बड़ी बात ये है कि इस हमले को, जैसा कि रिपोर्टें बता रही हैं, एक स्थानीय लड़के ने अंजाम दिया है. स्थानीय लड़के वहाबी और आईएसआईएस की विचारधारा से जुड़ रहे हैं. ये स्थिति चिंताजनक है. भारत सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए और समाधान खोजना चाहिए."
उन्होंने आगे कहा, "भारत सरकार को कश्मीर में लोगों से बात करनी चाहिए. उन लोगों से संपर्क करना चाहिए जो नाराज़ हैं. और ये भी महत्वपूर्ण है कि हम उन लोगों के बारे में सोचें जो कि कश्मीर में आतंकवाद के संपर्क में नहीं आए हैं. इस मामले में राजनीति करना हमारे देश के लिए ठीक नहीं है. हमें लोगों से संवाद करना होगा."
पूर्व डीजीपी और वर्तमान में ट्रांसपोर्ट कमिश्नर एसपी वैद गुरुवार को हुए हमले को बेहद घातक बताते हैं और कहते हैं कि ये ख़तरनाक घटना है.
वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि मैंने पहली बार इस तरह का आत्मघाती हमला देखा है जिसमें किसी काफ़िले को इस तरीके से निशाना बनाया गया है. हमलावर स्थानीय लड़का था. ये बहुत ख़तरनाक संकेत हैं. इसकी जांच होनी चाहिए कि ये क्यों और कैसे हुआ. यह जैश, लश्कर और उनकी जैसी सोच रखने वाले संगठनों की पैन-इस्लामिक विचारधारा है जिसने मासूम कश्मीरी को आत्मघाती हमलावर बना दिया."
जब उनसे पूछा गया कि चुनाव नज़दीक हैं, ऐसे में क्या इस तरह के हमलों से कश्मीर में तैनात सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ेगा, तो वैद ने इसका जवाब न में दिया.
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा. पहले भी चरमपंथियों ने हमले किए हैं और यह सिलसिला जारी है."
वैद ने कहा कि वह नहीं बता सकते कि यह सुरक्षा में चूक का मामला है या नहीं, मगर जांच होनी चाहिए कि यह घटना हुई कैसे. वह कहते हैं, "इसकी जांच ज़रूर होनी चाहिए और गहन पड़ताल के बाद चीज़ें साफ़ हो जाएंगी."
90 के दशक में जब कश्मीर में चरमपंथ का उदय हुआ था, चरमपंथी इस तरह के हमले करते रहे थे. 2005 तक यह सिलसिला चला. गुरुवार को हुए चरमपंथी हमले ने कश्मीर में सुरक्षा की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
पिछले साल सुरक्षा बलों ने कश्मीर में दावा किया था कि उन्होंने 250 से अधिक चरमपंथियों को मारा है, जिनमें शीर्ष नेता भी शामिल थे. पिछले कुछ सालों से दक्षिण कश्मीर को चरमपंथ का नया अड्डा माना जा रहा है.
2016 में हिज़्ब कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद 2018 तक दक्षिण कश्मीर में स्थानीय लड़के बड़ी संख्या में चरमपंथी संगठनों में भर्ती हुए हैं.
पत्रकार और टिप्पणीकार हारून रेशी कहते हैं कि गुरुवार का हमला आगे चलकर कश्मीर में चरमपंथ को बढ़ावा देगा.
उन्होंने कहा, ''चरमपंथियों का आज का हमला उनके लिए प्रोत्साहन होगा क्योंकि पिछले दो सालों में यहां सेना मज़बूत बनकर उभरी है. सुरक्षा एजेंसियों ने कश्मीर में करीब 500 चरमपंथियों को मारा है.''
हारून रेशी ने कहा, ''हाल ही में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राम माधव ने कहा था कि सुरक्षा बल कश्मीर में चरमपंथ ख़त्म करने में सफल हुए हैं. लेकिन ये हमला दिखाता है कि कश्मीर में भले ही कम चरमपंथी सक्रिय हों लेकिन वो घातक साबित हो सकते हैं. जैसा कि आज का हमला एक 21 साल के नौजवान ने किया था और आप देख सकते हैं कि वो कितना ख़तरनाक साबित हुआ है. ये हमला एक बड़ा संदेश है.''
पुलवामा ज़िले के लेथपोरा में आईईडी धमाके के ज़रिये 40 से ज़्याद जवानों से भरी एक बस को निशाना बनाया गया.
कश्मीर में रक्षा विशेषज्ञ सुरक्षा बलों पर हुए इस हमले को भारत सरकार की पूरी नाकामी बता रहे हैं.
पूर्व पुलिस उप-महानिदेशक और लेखक अली मोहम्मद वटाली ने कहा, "इस तरह के हमलों से यह संदेश निकलकर आता है कि चरमपंथियों को मारने की नीति नाकाम रही है. इस तरह का हमला समस्या को जटिल करता है."
मोहम्मद वटाली ने कहा, "भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कई बार कहा कि कुछ महीनों में कश्मीर में चरमपंथी ख़त्म हो जाएंगे. मगर उनकी बात सही साबित नहीं हुई. कश्मीर में स्थिति ख़राब होती जा रही है. सेना को इस्तेमाल करने का विकल्प इसे संभालने में नाकाम रहा है. कश्मीर में हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते."
मोहम्मद वटाली से जब पूछा गया कि पिछले कुछ सालों में तो चरमपंथी आत्मघाती या फ़िदायीन हमले नहीं करते थे, तो उन्होंने कहा, "यही तो मैं बता रहा हूं. एक समय ऐसा था जब इस तरह के हमले होना आम बात हो गई थी. मगर हम एक बार फिर उसी दौर में प्रवेश कर रहे हैं जब ऐसे हमले हो रहे हैं."
पूर्व पुलिस महानिदेशक एम.एम. खजूरिया कहते हैं कि कश्मीर में जो चल रहा है, वो ऐसी लड़ाई नहीं है जो एक-दो महीनों में ख़त्म हो जाए. वह मानते हैं कि ये एक लंबा संघर्ष है.
खजूरिया कहते हैं, "ये लड़ाई महीनों में ख़त्म नहीं हो सकती. जबसे इसमें वहाबी (मुस्लिमों का एक वर्ग जिनकी संख्या सऊदी अरब में ज़्यादा है) फ़ैक्टर जुड़ा है, नया खेल शुरू हो गया है. आज जो हुआ, वो एक बड़ा हमला था. दूसरी बड़ी बात ये है कि इस हमले को, जैसा कि रिपोर्टें बता रही हैं, एक स्थानीय लड़के ने अंजाम दिया है. स्थानीय लड़के वहाबी और आईएसआईएस की विचारधारा से जुड़ रहे हैं. ये स्थिति चिंताजनक है. भारत सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए और समाधान खोजना चाहिए."
उन्होंने आगे कहा, "भारत सरकार को कश्मीर में लोगों से बात करनी चाहिए. उन लोगों से संपर्क करना चाहिए जो नाराज़ हैं. और ये भी महत्वपूर्ण है कि हम उन लोगों के बारे में सोचें जो कि कश्मीर में आतंकवाद के संपर्क में नहीं आए हैं. इस मामले में राजनीति करना हमारे देश के लिए ठीक नहीं है. हमें लोगों से संवाद करना होगा."
पूर्व डीजीपी और वर्तमान में ट्रांसपोर्ट कमिश्नर एसपी वैद गुरुवार को हुए हमले को बेहद घातक बताते हैं और कहते हैं कि ये ख़तरनाक घटना है.
वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि मैंने पहली बार इस तरह का आत्मघाती हमला देखा है जिसमें किसी काफ़िले को इस तरीके से निशाना बनाया गया है. हमलावर स्थानीय लड़का था. ये बहुत ख़तरनाक संकेत हैं. इसकी जांच होनी चाहिए कि ये क्यों और कैसे हुआ. यह जैश, लश्कर और उनकी जैसी सोच रखने वाले संगठनों की पैन-इस्लामिक विचारधारा है जिसने मासूम कश्मीरी को आत्मघाती हमलावर बना दिया."
जब उनसे पूछा गया कि चुनाव नज़दीक हैं, ऐसे में क्या इस तरह के हमलों से कश्मीर में तैनात सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ेगा, तो वैद ने इसका जवाब न में दिया.
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा. पहले भी चरमपंथियों ने हमले किए हैं और यह सिलसिला जारी है."
वैद ने कहा कि वह नहीं बता सकते कि यह सुरक्षा में चूक का मामला है या नहीं, मगर जांच होनी चाहिए कि यह घटना हुई कैसे. वह कहते हैं, "इसकी जांच ज़रूर होनी चाहिए और गहन पड़ताल के बाद चीज़ें साफ़ हो जाएंगी."
90 के दशक में जब कश्मीर में चरमपंथ का उदय हुआ था, चरमपंथी इस तरह के हमले करते रहे थे. 2005 तक यह सिलसिला चला. गुरुवार को हुए चरमपंथी हमले ने कश्मीर में सुरक्षा की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
पिछले साल सुरक्षा बलों ने कश्मीर में दावा किया था कि उन्होंने 250 से अधिक चरमपंथियों को मारा है, जिनमें शीर्ष नेता भी शामिल थे. पिछले कुछ सालों से दक्षिण कश्मीर को चरमपंथ का नया अड्डा माना जा रहा है.
2016 में हिज़्ब कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद 2018 तक दक्षिण कश्मीर में स्थानीय लड़के बड़ी संख्या में चरमपंथी संगठनों में भर्ती हुए हैं.
पत्रकार और टिप्पणीकार हारून रेशी कहते हैं कि गुरुवार का हमला आगे चलकर कश्मीर में चरमपंथ को बढ़ावा देगा.
उन्होंने कहा, ''चरमपंथियों का आज का हमला उनके लिए प्रोत्साहन होगा क्योंकि पिछले दो सालों में यहां सेना मज़बूत बनकर उभरी है. सुरक्षा एजेंसियों ने कश्मीर में करीब 500 चरमपंथियों को मारा है.''
हारून रेशी ने कहा, ''हाल ही में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राम माधव ने कहा था कि सुरक्षा बल कश्मीर में चरमपंथ ख़त्म करने में सफल हुए हैं. लेकिन ये हमला दिखाता है कि कश्मीर में भले ही कम चरमपंथी सक्रिय हों लेकिन वो घातक साबित हो सकते हैं. जैसा कि आज का हमला एक 21 साल के नौजवान ने किया था और आप देख सकते हैं कि वो कितना ख़तरनाक साबित हुआ है. ये हमला एक बड़ा संदेश है.''
Thursday, February 7, 2019
भारत के लिए अब करो या मरो जैसी हालत
एकदिवसीय सिरीज़ 4-1 से हारने के बाद तिलमिलाई न्यूज़ीलैंड ने तीन टी-20 मैचों की सिरीज़ के पहले मैच में भारत को 80 रन से करारी मात दी.
दोनो टीमों के बीच दूसरा टी-20 मुक़ाबला ऑकलैंड में शुक्रवार को खेला जाएगा.
भारत के लिए अब करो या मरो वाले हालात है.
अगर ऑकलैंड में जीत तो सिरीज़ में भारत बना रहेगा, अगर हारा तो न्यूज़ीलैंड के पास 2-0 की अजेय बढ़त होगी.
दूसरी तरफ न्यूज़ीलैंड हर हालत में दूसरा टी-20 मुक़ाबला जीतना चाहेगा.
इससे उसे एकदिवसीय सिरीज़ में मिली हार का ग़म कुछ कम होगा.
न्यूज़ीलैंड ने जिस अंदाज़ में पहला टी-20 मुक़ाबला जीता उसके बाद तो भारत के कप्तान रोहित शर्मा भी यह कहने को मजबूर हो गए कि विरोधी तीनों विभाग में भारी पड़े.
न्यूज़ीलैंड ने पहले तो निर्धारित 20 ओवर में 6 विकेट पर 219 रन बनाकर भारत पर मानसिक दबाव बनाया.
यह उसका टी-20 क्रिकेट में भारत के ख़िलाफ सर्वाधिक स्कोर है.
उसके बाद न्यूज़ीलैंड के गेंदबाज़ो ने पूरी भारतीय टीम को 19.2 ओवर में 139 रन पर ढेर कर दिया.
80 रनों से भारत हारा, और यह न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ टी-20 क्रिकेट में रनों की लिहाज़ से सबसे बड़ी हार है.
हैरानी की बात है कि भारतीय टीम वेलिंग्टन में कहने को आठ बल्लेबाज़ो के साथ मैदान में उतरी थी.
भारतीय टीम में फिनिशर के तौर पर ऋषभ पंत, महेंद्र सिंह धोनी, दिनेश कार्तिक और हार्दिक पांड्या थे.
अब सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि एक ही टीम में क्या तीन विकेटकीपर बल्लेबाज़ खेलने चाहिए.
भारत को छोड़ कर शायद ही पूरी दुनिया में क्रिकेट खेल रही किसी टीम का संयोजन ऐसा हो.
दरअसल ऐसा होने से टीम का क्षेत्ररक्षण बेहद कमज़ोर हो जाता है.
दिनेश कार्तिक मूल रूप से विकेटकीपर होने के कारण बाउंड्री लाइन के पास आते कैच नही पकड़ पाते.
दूसरी तरफ ऋषभ पंत भी बहुत तेज़ तर्रार फ़ील्डर नही हैं.
कुछ क्रिकेट खिलाड़ियो और समीक्षकों का मानना है कि अगर ऋषभ पंत विश्व कप की टीम में ज़रूर होंगे तो फिर उन्हे ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ खेली गई एकदिवसीय सिरीज़ में आराम क्यों दिया गया.
वेलिंग्टन में ही भारत एकदिवसीय मुक़ाबले में एक समय 18 रन पर चार विकेट गंवाने के बावजूद 35 रन से हार गया था लेकिन टी-20 मुक़ाबले में न्यूज़ीलैंड के गेंदबाज़ों ने भारत को वापसी का मौक़ा नही दिया.
65 रन पर चार विकेट खोने के बाद भारत लगातार झटके खाता रहा.
टिम साउदी, लोकी फर्गयूसन, ईश सोढ़ी और मिचेल सैंटनर ने ना तो भारतीय बल्लेबाज़ो को खुलकर बल्लेबाज़ी करने का मौक़ा दिया और ना ही विकेट पर जमने का.
गेंदबाज़ी में हार्दिक पांड्या, खलील अहमद और भुवनेश्वर कुमार की तेज़ गेंदबाज़ो की तिकडी के अलावा स्पिन जोड़ी कृणाल पांड्या और युज़वेन्दर चहल सभी नाकाम रहे.
खलील अहमद ने जिस तरह से गेंद को पटकने और शॉर्ट पिच करने की कोशिश की उससे न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ो का ही काम आसान हुआ.
भुवनेश्वर कुमार अपनी स्विंग गेंदो के लिए जाने जाते है लेकिन इन दिनों उनकी गति तो देखने को मिल रही है लेकिन स्विंग नही.
एक बार न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ खुले तो उसके बाद वह किसी के रोके ना रुके.
219 रनों के स्कोर में उन्होंने 14 छक्के और 14 ही चौक्के जमाए.
सभी शॉट्स इतने ताक़तवर और सही टाईमिंग के साथ थे कि भारतीय फिल्डर्स के पास उन्हें बाउंड्री लाइन से बाहर जाते देखने के अलावा कोई चारा नही था.
ऐसे में सलामी बल्लेबाज़ टिम सैफर्ट जिन्होंने 6 छक्के और 7 चौक्को की मदद से केवल 43 गेंदो पर 84 रन बनाए उनसे एक बार फिर बचकर रहना होगा.
इससे बाद कोलिन मुनरो, कप्तान केन विलियमसन, रोस टेलर और मिचेल सैंटनर को भी रोकना होगा.
जीत से खुश न्यूज़ीलैंड के कप्तान केन विलियमसन टीम में शायद ही कोई बदलाव करे.
वहीं भारत के पास कुलदीप यादव, केदार जाधव, सिद्धार्थ कौल और मोहम्मद सिराज को आज़माने का अवसर है लेकिन यह सब कप्तान रोहित शर्मा की पसंद पर निर्भर करता है.
दोनो टीमों के बीच दूसरा टी-20 मुक़ाबला ऑकलैंड में शुक्रवार को खेला जाएगा.
भारत के लिए अब करो या मरो वाले हालात है.
अगर ऑकलैंड में जीत तो सिरीज़ में भारत बना रहेगा, अगर हारा तो न्यूज़ीलैंड के पास 2-0 की अजेय बढ़त होगी.
दूसरी तरफ न्यूज़ीलैंड हर हालत में दूसरा टी-20 मुक़ाबला जीतना चाहेगा.
इससे उसे एकदिवसीय सिरीज़ में मिली हार का ग़म कुछ कम होगा.
न्यूज़ीलैंड ने जिस अंदाज़ में पहला टी-20 मुक़ाबला जीता उसके बाद तो भारत के कप्तान रोहित शर्मा भी यह कहने को मजबूर हो गए कि विरोधी तीनों विभाग में भारी पड़े.
न्यूज़ीलैंड ने पहले तो निर्धारित 20 ओवर में 6 विकेट पर 219 रन बनाकर भारत पर मानसिक दबाव बनाया.
यह उसका टी-20 क्रिकेट में भारत के ख़िलाफ सर्वाधिक स्कोर है.
उसके बाद न्यूज़ीलैंड के गेंदबाज़ो ने पूरी भारतीय टीम को 19.2 ओवर में 139 रन पर ढेर कर दिया.
80 रनों से भारत हारा, और यह न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ टी-20 क्रिकेट में रनों की लिहाज़ से सबसे बड़ी हार है.
हैरानी की बात है कि भारतीय टीम वेलिंग्टन में कहने को आठ बल्लेबाज़ो के साथ मैदान में उतरी थी.
भारतीय टीम में फिनिशर के तौर पर ऋषभ पंत, महेंद्र सिंह धोनी, दिनेश कार्तिक और हार्दिक पांड्या थे.
अब सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि एक ही टीम में क्या तीन विकेटकीपर बल्लेबाज़ खेलने चाहिए.
भारत को छोड़ कर शायद ही पूरी दुनिया में क्रिकेट खेल रही किसी टीम का संयोजन ऐसा हो.
दरअसल ऐसा होने से टीम का क्षेत्ररक्षण बेहद कमज़ोर हो जाता है.
दिनेश कार्तिक मूल रूप से विकेटकीपर होने के कारण बाउंड्री लाइन के पास आते कैच नही पकड़ पाते.
दूसरी तरफ ऋषभ पंत भी बहुत तेज़ तर्रार फ़ील्डर नही हैं.
कुछ क्रिकेट खिलाड़ियो और समीक्षकों का मानना है कि अगर ऋषभ पंत विश्व कप की टीम में ज़रूर होंगे तो फिर उन्हे ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ खेली गई एकदिवसीय सिरीज़ में आराम क्यों दिया गया.
वेलिंग्टन में ही भारत एकदिवसीय मुक़ाबले में एक समय 18 रन पर चार विकेट गंवाने के बावजूद 35 रन से हार गया था लेकिन टी-20 मुक़ाबले में न्यूज़ीलैंड के गेंदबाज़ों ने भारत को वापसी का मौक़ा नही दिया.
65 रन पर चार विकेट खोने के बाद भारत लगातार झटके खाता रहा.
टिम साउदी, लोकी फर्गयूसन, ईश सोढ़ी और मिचेल सैंटनर ने ना तो भारतीय बल्लेबाज़ो को खुलकर बल्लेबाज़ी करने का मौक़ा दिया और ना ही विकेट पर जमने का.
गेंदबाज़ी में हार्दिक पांड्या, खलील अहमद और भुवनेश्वर कुमार की तेज़ गेंदबाज़ो की तिकडी के अलावा स्पिन जोड़ी कृणाल पांड्या और युज़वेन्दर चहल सभी नाकाम रहे.
खलील अहमद ने जिस तरह से गेंद को पटकने और शॉर्ट पिच करने की कोशिश की उससे न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ो का ही काम आसान हुआ.
भुवनेश्वर कुमार अपनी स्विंग गेंदो के लिए जाने जाते है लेकिन इन दिनों उनकी गति तो देखने को मिल रही है लेकिन स्विंग नही.
एक बार न्यूज़ीलैंड के बल्लेबाज़ खुले तो उसके बाद वह किसी के रोके ना रुके.
219 रनों के स्कोर में उन्होंने 14 छक्के और 14 ही चौक्के जमाए.
सभी शॉट्स इतने ताक़तवर और सही टाईमिंग के साथ थे कि भारतीय फिल्डर्स के पास उन्हें बाउंड्री लाइन से बाहर जाते देखने के अलावा कोई चारा नही था.
ऐसे में सलामी बल्लेबाज़ टिम सैफर्ट जिन्होंने 6 छक्के और 7 चौक्को की मदद से केवल 43 गेंदो पर 84 रन बनाए उनसे एक बार फिर बचकर रहना होगा.
इससे बाद कोलिन मुनरो, कप्तान केन विलियमसन, रोस टेलर और मिचेल सैंटनर को भी रोकना होगा.
जीत से खुश न्यूज़ीलैंड के कप्तान केन विलियमसन टीम में शायद ही कोई बदलाव करे.
वहीं भारत के पास कुलदीप यादव, केदार जाधव, सिद्धार्थ कौल और मोहम्मद सिराज को आज़माने का अवसर है लेकिन यह सब कप्तान रोहित शर्मा की पसंद पर निर्भर करता है.
Monday, January 28, 2019
सेंसेक्स 369 अंक गिरकर 35657 पर बंद, निफ्टी में 119 प्वाइंट की गिरावट
शेयर बाजार सोमवार को भारी नुकसान में रहा। सेंसेक्स 369 अंक गिरकर 35657 पर बंद हुआ। निफ्टी की क्लोजिंग 119 प्वाइंट की गिरावट के साथ 10,662 पर हुई। बैंकिंग, ऑटो और मेटल शेयरों में बिकवाली का दबाव ज्यादा रहा। ब्रोकर्स का कहना है कि कुछ बड़ी कंपनियों के तिमाही नतीजे कमजोर रहने और अमेरिका-चीन के बीच व्यापार वार्ता को लेकर अनिश्चितता की वजह से निवेशकों के मन में चिंता है।
इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस में 6.5% गिरावट
सेंसेक्स के 30 में से 23 और निफ्टी के 50 में से 36 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए। बीएसई पर 19 में से 17 सेक्टर इंडेक्स नुकसान में रहे। फाइनेंस इंडेक्स 2.1% लुढ़क गया।
एनएसई पर अडानी पोर्ट्स का शेयर 12.53% गिरावट के साथ बंद हुआ। इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस का शेयर 6.51% नुकसान में रहा। कारोबार के दौरान वोडाफोन-आईडिया के शेयर की क्लोजिंग 4.87% नीचे हुई। इंट्रा-डे में यह 13% गिरकर 28.45 रुपए के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था।
जी मीडिया के शेयर में 19% गिरावट
एस्सेल ग्रुप की कंपनी जी एंटरटेनमेंट का शेयर 16%, एस्सेल प्रोपैक 13.5% और डिश टीवी 8% फायदे में रहा। शुक्रवार को शेयर 33% गिरने के बाद एस्सेल ग्रुप ने रविवार को कहा कि कर्जदाता प्रमोटरों को डिफॉल्टर घोषित नहीं करेंगे। प्रमोटरों ने कर्ज लेने के लिए बैंकों, एनबीएफसी और म्यूचुअल फंडों के पास शेयर गिरवी रखे हैं। इस ऐलान से शेयर में तेजी आई। हालांकि, ग्रुप की 2 अन्य कंपनियों जी मीडिया ने 19% और जी लर्न ने 6% नीचे कारोबार खत्म किया।
शेयर बाजार में लगातार दूसरे सत्र में गिरावट
सेंसेक्स शुक्रवार को 169 अंक की गिरावट के साथ 36,025.54 पर बंद हुआ था। निफ्टी की क्लोजिंग 69.25 प्वाइंट नीचे 10,780.55 पर हुई थी। उस दिन विदेशी निवेशकों ने 689.28 करोड़ रुपए के शेयर खरीदे थे। घरेलू निवेशकों ने 147.35 करोड़ की बिकवाली की थी।
मैच जीतने के बाद जोकोविच ने नडाल की तारीफ करते हुए कहा कि चोट से वापस आकर खेलना बेहद कठिन है। आपने सभी को फाइटिंग स्पिरिट के बारे में सिखाया, उसके लिए बहुत शुक्रिया। पिछले चार में से तीन टाइटल जीतना बेहतरीन अनुभव है। जोकोविच ने अपनी टीम और परिवार का भी शुक्रिया जताया।
वेस्टइंडीज ने इंग्लैंड को तीन टेस्ट की सीरीज के पहले मैच में 381 रन से हरा दिया। इस मैच में विंडीज के लिए कप्तान जेसन होल्डर ने दोहरा शतक लगाया और दो विकेट भी लिए। उन्हें मैन ऑफ द मैच चुना गया था। इस प्रदर्शन के बाद वे आईसीसी रैंकिंग में नंबर-1 ऑलराउंडर बन गए। वे गारफील्ड सोबर्स के बाद इस पायदान पर पहुंचने वाले अपने देश के पहले ऑलराउंडर बने। सोबर्स 1974 में नंबर-1 ऑलराउंडर थे।
होल्डर ने करियर की सर्वश्रेष्ठ 440 रेटिंग अंक हासिल किए। रैंकिंग में बांग्लादेश के शाकिब अल हसन दूसरे पायदान पर हैं। हसन के 415 अंक हैं। तीसरे स्थान पर भारत के रविंद्र जडेजा हैं। उनके 387 अंक हैं।
सोबर्स के जमाने में विपक्षी टीम के स्तर और अन्य खिलाड़ियों के आंकड़े को ध्यान में नहीं रखा जाता था। रैंकिंग प्रणाली नहीं थी। पूर्व क्रिकेटरों की राय और प्रदर्शन के आधार पर सोबर्स को सर्वश्रेष्ठ ऑलराउंडर कहा जाता था। वे 1974 में संन्यास लेने के समय टॉप पर थे।
इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस में 6.5% गिरावट
सेंसेक्स के 30 में से 23 और निफ्टी के 50 में से 36 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए। बीएसई पर 19 में से 17 सेक्टर इंडेक्स नुकसान में रहे। फाइनेंस इंडेक्स 2.1% लुढ़क गया।
एनएसई पर अडानी पोर्ट्स का शेयर 12.53% गिरावट के साथ बंद हुआ। इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस का शेयर 6.51% नुकसान में रहा। कारोबार के दौरान वोडाफोन-आईडिया के शेयर की क्लोजिंग 4.87% नीचे हुई। इंट्रा-डे में यह 13% गिरकर 28.45 रुपए के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था।
जी मीडिया के शेयर में 19% गिरावट
एस्सेल ग्रुप की कंपनी जी एंटरटेनमेंट का शेयर 16%, एस्सेल प्रोपैक 13.5% और डिश टीवी 8% फायदे में रहा। शुक्रवार को शेयर 33% गिरने के बाद एस्सेल ग्रुप ने रविवार को कहा कि कर्जदाता प्रमोटरों को डिफॉल्टर घोषित नहीं करेंगे। प्रमोटरों ने कर्ज लेने के लिए बैंकों, एनबीएफसी और म्यूचुअल फंडों के पास शेयर गिरवी रखे हैं। इस ऐलान से शेयर में तेजी आई। हालांकि, ग्रुप की 2 अन्य कंपनियों जी मीडिया ने 19% और जी लर्न ने 6% नीचे कारोबार खत्म किया।
शेयर बाजार में लगातार दूसरे सत्र में गिरावट
सेंसेक्स शुक्रवार को 169 अंक की गिरावट के साथ 36,025.54 पर बंद हुआ था। निफ्टी की क्लोजिंग 69.25 प्वाइंट नीचे 10,780.55 पर हुई थी। उस दिन विदेशी निवेशकों ने 689.28 करोड़ रुपए के शेयर खरीदे थे। घरेलू निवेशकों ने 147.35 करोड़ की बिकवाली की थी।
मैच जीतने के बाद जोकोविच ने नडाल की तारीफ करते हुए कहा कि चोट से वापस आकर खेलना बेहद कठिन है। आपने सभी को फाइटिंग स्पिरिट के बारे में सिखाया, उसके लिए बहुत शुक्रिया। पिछले चार में से तीन टाइटल जीतना बेहतरीन अनुभव है। जोकोविच ने अपनी टीम और परिवार का भी शुक्रिया जताया।
वेस्टइंडीज ने इंग्लैंड को तीन टेस्ट की सीरीज के पहले मैच में 381 रन से हरा दिया। इस मैच में विंडीज के लिए कप्तान जेसन होल्डर ने दोहरा शतक लगाया और दो विकेट भी लिए। उन्हें मैन ऑफ द मैच चुना गया था। इस प्रदर्शन के बाद वे आईसीसी रैंकिंग में नंबर-1 ऑलराउंडर बन गए। वे गारफील्ड सोबर्स के बाद इस पायदान पर पहुंचने वाले अपने देश के पहले ऑलराउंडर बने। सोबर्स 1974 में नंबर-1 ऑलराउंडर थे।
होल्डर ने करियर की सर्वश्रेष्ठ 440 रेटिंग अंक हासिल किए। रैंकिंग में बांग्लादेश के शाकिब अल हसन दूसरे पायदान पर हैं। हसन के 415 अंक हैं। तीसरे स्थान पर भारत के रविंद्र जडेजा हैं। उनके 387 अंक हैं।
सोबर्स के जमाने में विपक्षी टीम के स्तर और अन्य खिलाड़ियों के आंकड़े को ध्यान में नहीं रखा जाता था। रैंकिंग प्रणाली नहीं थी। पूर्व क्रिकेटरों की राय और प्रदर्शन के आधार पर सोबर्स को सर्वश्रेष्ठ ऑलराउंडर कहा जाता था। वे 1974 में संन्यास लेने के समय टॉप पर थे।
Thursday, January 17, 2019
केरलः बिशप मुलक्कल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाली ननों का ट्रांसफ़र आदेश मानने से इनकार
केरल में बलात्कार के आरोप में घिरे जालंधर के बिशप फ़्रैंको मुलक्कल का विरोध करने वाली पांच में से चार ननों को कोट्टयम ज़िले में उनके कॉन्वेंट छोड़ने का निर्देश दिया गया है.
लेकिन, ये नन पूरी तरह से निडर हैं. इनमें से एक नन सिस्टर अनुपमा ने बीबीसी को बताया, "हम डरे हुए नहीं हैं. अगर वे हमें जाने के लिए कह रहे हैं तो हम नहीं जाएंगे. यदि वे हमें बर्खास्त कर देते हैं तो उन्हें करने दें. कोई बात नहीं. हम यहीं रहेंगे."
सिस्टर अनुपमा, सिस्टर एल्फी, सिस्टर जोसेफ़िन और सिस्टर एनसिटा ने कोच्चि में एक सार्वजनिक मंच से जालंधर के बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की थी जिससे 'सेव आवर सिस्टर्स' आंदोलन का नाम दिया गया था.
22 सितंबर को बिशप फ़्रैंको मुलक्कल को 30 घंटे की पूछताछ का साथ जालंधर से गिरफ़्तार किया गया था. बिशप फ़्रैंको पर साल 2014 से 2016 के बीच एक नन के साथ बलात्कार करने का आरोप है.
सिस्टर एनसिटा को केरल के कुन्नूर, सिस्टर जोसफ़ी को झारखंड, सिस्टर एल्फ़ी को बिहार और सिस्टर अनुपमा का तबादला पंजाब में किया गया है.
इन चारों ननों को लगभग एक जैसी ही चिट्ठी दी गई है. मिशनरी जीसस की सुपीरियर जनरल और मदर सुपीरियर रेजिना कदमथोट्टु ने बीबीसी से कहा, 'सच जनता के सामने आ रहा है'.
ननों का मानना है कि ये ट्रांसफ़र का फ़ैसला उनपर एक तरह का दबाव बनाने का तरीका है जिससे वे रेप का शिकार हुई नन को बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के खिलाफ़ केस वापस लेने के लिए तैयार करें.
सिस्टर अनुपमा ने कहा, '' हम इस केस की चश्मदीद हैं. हमारे लिए हमेशा केस के लिए सफ़र करना मुश्किल होगा. ऐसा करना हमारे ऊपर केस को वापस लेने का दबाव बनाने जैसा है. ''
फ़ादर अगस्टीन को चर्च ने कहा है कि या तो वे 'सेव ऑर सिस्टर' आंदोलन से ख़ुद को अलग कर लें या फ़िर कार्रवाई झेलने को तैयार रहें.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, ''ये सिस्टर केस की गवाह हैं. उन्हें इस तरह अलग करना प्रतिशोध से भरा काम है. ये साफ़ संदेश दिया जा रहा है कि चर्च ऐसे विरोधों को बर्दाश्त नहीं करेगा. और ऐसा तब किया जा रहा है जब पोप फ़्रांसिस ने अपने क्रिसमस संबोधन में साफ़ कहा था कि चर्च यौन उत्पीड़न क़तई बर्दाश्त नहीं करेगा.''
कैथोलिक बिशप काउंसिल फ़ॉर वुमेन की पूर्व कमिश्नर वर्जीनिया सलडान्हा ने कहा, ''वे लोग अपने पावर का इस्तेमाल ख़ुद को बचाने के लिए कर रहे हैं.
ननों की प्रमुख 'मदर सुपीरियर' जिन्होंने ट्रांसफ़र के आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं, वो ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के दबाव में काम कर रही हैं. मदर सुपीरियर बिशप मुलक्कल के अंतर्गत काम कर रही हैं और वो जो भी कर रही हैं वो बिशप को बचाने के लिए कर रही हैं. ''
''मदर सुपीरियर जो भी कर रही हैं वो महिला विरोधी है. लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा ही होता है. जहां महिलाएं महिला के मुकाबले पुरूष को वरीयता देती हैं.''
लेकिन, ये नन पूरी तरह से निडर हैं. इनमें से एक नन सिस्टर अनुपमा ने बीबीसी को बताया, "हम डरे हुए नहीं हैं. अगर वे हमें जाने के लिए कह रहे हैं तो हम नहीं जाएंगे. यदि वे हमें बर्खास्त कर देते हैं तो उन्हें करने दें. कोई बात नहीं. हम यहीं रहेंगे."
सिस्टर अनुपमा, सिस्टर एल्फी, सिस्टर जोसेफ़िन और सिस्टर एनसिटा ने कोच्चि में एक सार्वजनिक मंच से जालंधर के बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की थी जिससे 'सेव आवर सिस्टर्स' आंदोलन का नाम दिया गया था.
22 सितंबर को बिशप फ़्रैंको मुलक्कल को 30 घंटे की पूछताछ का साथ जालंधर से गिरफ़्तार किया गया था. बिशप फ़्रैंको पर साल 2014 से 2016 के बीच एक नन के साथ बलात्कार करने का आरोप है.
सिस्टर एनसिटा को केरल के कुन्नूर, सिस्टर जोसफ़ी को झारखंड, सिस्टर एल्फ़ी को बिहार और सिस्टर अनुपमा का तबादला पंजाब में किया गया है.
इन चारों ननों को लगभग एक जैसी ही चिट्ठी दी गई है. मिशनरी जीसस की सुपीरियर जनरल और मदर सुपीरियर रेजिना कदमथोट्टु ने बीबीसी से कहा, 'सच जनता के सामने आ रहा है'.
ननों का मानना है कि ये ट्रांसफ़र का फ़ैसला उनपर एक तरह का दबाव बनाने का तरीका है जिससे वे रेप का शिकार हुई नन को बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के खिलाफ़ केस वापस लेने के लिए तैयार करें.
सिस्टर अनुपमा ने कहा, '' हम इस केस की चश्मदीद हैं. हमारे लिए हमेशा केस के लिए सफ़र करना मुश्किल होगा. ऐसा करना हमारे ऊपर केस को वापस लेने का दबाव बनाने जैसा है. ''
फ़ादर अगस्टीन को चर्च ने कहा है कि या तो वे 'सेव ऑर सिस्टर' आंदोलन से ख़ुद को अलग कर लें या फ़िर कार्रवाई झेलने को तैयार रहें.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, ''ये सिस्टर केस की गवाह हैं. उन्हें इस तरह अलग करना प्रतिशोध से भरा काम है. ये साफ़ संदेश दिया जा रहा है कि चर्च ऐसे विरोधों को बर्दाश्त नहीं करेगा. और ऐसा तब किया जा रहा है जब पोप फ़्रांसिस ने अपने क्रिसमस संबोधन में साफ़ कहा था कि चर्च यौन उत्पीड़न क़तई बर्दाश्त नहीं करेगा.''
कैथोलिक बिशप काउंसिल फ़ॉर वुमेन की पूर्व कमिश्नर वर्जीनिया सलडान्हा ने कहा, ''वे लोग अपने पावर का इस्तेमाल ख़ुद को बचाने के लिए कर रहे हैं.
ननों की प्रमुख 'मदर सुपीरियर' जिन्होंने ट्रांसफ़र के आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं, वो ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के दबाव में काम कर रही हैं. मदर सुपीरियर बिशप मुलक्कल के अंतर्गत काम कर रही हैं और वो जो भी कर रही हैं वो बिशप को बचाने के लिए कर रही हैं. ''
''मदर सुपीरियर जो भी कर रही हैं वो महिला विरोधी है. लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा ही होता है. जहां महिलाएं महिला के मुकाबले पुरूष को वरीयता देती हैं.''
Wednesday, January 9, 2019
शाह फ़ैसलः 'मैं कश्मीर की राजनीति का हिस्सा बनना चाहूंगा'
साल 2009 में कश्मीर के सिविल सेवा परीक्षा टॉपर आईएएस अधिकारी शाह फ़ैसल ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उन्होंने ट्विटर के ज़रिए अपने इस्तीफ़े की जानकारी दी.
अपने इस्तीफ़े पर शाह फ़ैसल ने श्रीनगर में बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर से विस्तार से बातचीत की और इस बात के संकेत दिए कि वे राजनीति में क़दम रखने की योजना बना रहे हैं.
''मैंने कभी नहीं कहा कि नौकरी नहीं छोड़ सकता. मेरे लिए हमेशा नौकरी एक इंस्ट्रूमेंट था, लोगों की ख़िदमत करने का. अवाम की ख़िदमत कई तरीक़ों से हो सकती है, जो भी पब्लिक सर्विस में होते हैं, वो सब लोगों की ख़िदमत करते हैं. पिछले साल-दो साल से हमने जिस तरह से मुल्क में हालात देखे, जम्मू-कश्मीर में देखे. कश्मीर में हत्याओं का एक सिलसिला देखने को मिला.''
''हिंदू-मुस्लिम के बीच बढ़ते अंतर को देखा. रोंगटे खड़े करने वाले वीडियो हमने देखे. गौरक्षा के नाम पर उपद्रव देखने को मिला. ये तो कभी देखने को नहीं मिला था. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश की कोशिशें हमने देखीं. ''
'ऐसे में एक ऑफ़िसर का नौकरी में रहना संभव नहीं था. और समाज के नैतिक सवालों से अलग हो कर रहना और उनपर रिएक्ट नहीं करना, मेरे लिए संभव नहीं था. मैंने चीज़ों पर पहले भी बोला है, लेकिन अब वो वक़्त आ चुका था कि इस खुलकर बोलने की ज़रूरत थी, ये काम नौकरी छोड़कर ही किया जा सकता था.''
''सिविल सर्विस कोड की बात जब होती है, तो उसके मुताबिक़ अभिव्यक्ति की आज़ादी थोड़ी प्रभावित होती है. राजनीति पब्लिक सर्विस का एक्सटेंशन है. अब तक मैं राजनेताओं के साथ काम कर रहा था. ''
''अब ख़ुद पॉलिटिक्स कर सकता हूं, एक्टिविस्ट बन सकता हूं. अवाम की बात करना और अवाम का काम करना, पॉलिटिक्स ये दो चीज़ें मुहैया कराती हैं. मैं सोच रहा हूं कि अगर मुझे मौक़ा मिलता है तो पॉलिटिक्स में जा सकता हूं. ''
क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी में शामिल होने पर विचार
''अभी ये तय नहीं है कि किस पार्टी से जुड़ूँगा. हर पार्टी की अपनी लीगेसी है. अगर कभी पॉलिटिक्स में गया तो उस पार्टी से जुड़ूँगा जो मुझे राज्य के इस मौजूदा हालात पर खुलकर बात करने की आज़ादी देगी. ''
''मैं ऐसी पार्टी का हिस्सा बनना चाहूँगा जिसमें मुझे अल्पसंख्यकों के साथ, कश्मीरियों के साथ हो रही राजनीति को लेकर खुलकर बात करने का मौक़ा मिले. मैं अपने विकल्पों के बारे में सोच रहा हूं और जल्द ही इसपर फ़ैसला करूंगा.''
ये पढ़ेंः कश्मीरी लड़कियों में सिविल सेवा का बढ़ता क्रेज़
''मेरे लिए रीजनल पार्टी में जाना ज़्यादा सही होगा. मैं कश्मीर की बात करना चाहता हूं. हमें समझना होगा कि संसद की मुहर के बिना कोई भी तब्दीली नहीं की जा सकती. मैं संसद में कश्मीरियों की आवाज़ बनना चाहता हूं.''
''कई लोग मुझसे कह रहे हैं कि नई पार्टी बनानी चाहिए लेकिन मुझे लगता है कि अभी राज्य को एकता की ज़रूरत है. जितनी ज़्यादा पार्टियां बनेंगी उतना ही ज़्यादा जनमत विभाजित होगा.''
ये ज़रूरी नहीं कि आप एक नौकरी में 30 साल या 50 साल तक रहें. 10 साल में मुझे आईएएस रहते हुए बेहतरीन अवसर मिले. मैंने संस्थाओं को समझा, लोगों के लिए काम किया, प्रक्रिया समझने का मौक़ा मिला. दुनिया में हर कोई नौकरी बदलता है. मैंने इस लिए ये पद छोड़ा क्योंकि पद पर रहते हुए कई मुद्दों पर बात करना मेरे लिए ठीक नहीं होता.''
''अब तक हमने झूठ की राजनीति देखी है, मैं कुछ छोड़कर राजनीति में आ रहा हूं. मैं अपने आदर्शों को अपने विजन को राजनीति में लाना चाहता हूं अगर ऐसा मौक़ा नहीं मिल पाता है तो राजनीति मेरे लिए आख़िरी पड़ाव नहीं है.''
''साख की बात करूं तो राज्य में अगर मैं राजनीति का हिस्सा नहीं बनूंगा तो कोई और बनेगा, कश्मीर को बेहतर लोगों और नौजवानों की ज़रूरत है. यही सोचकर मैं राजनीति में क़दम रखने की सोच रहा हूं.''
''मौजूदा कश्मीर में लोगों के बीच एक कंफ़्यूजन की स्थिति है. ये बेहद ज़रूरी है कि लोगों में यक़ीन लाया जाए कि ये लोग कश्मीर की बात करेंगे. जबतक मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियां सच नहीं बोलना शरू करेंगी तब तक कश्मीर में उनका भविष्य धुंधला रहेगा.''
अपने इस्तीफ़े पर शाह फ़ैसल ने श्रीनगर में बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर से विस्तार से बातचीत की और इस बात के संकेत दिए कि वे राजनीति में क़दम रखने की योजना बना रहे हैं.
''मैंने कभी नहीं कहा कि नौकरी नहीं छोड़ सकता. मेरे लिए हमेशा नौकरी एक इंस्ट्रूमेंट था, लोगों की ख़िदमत करने का. अवाम की ख़िदमत कई तरीक़ों से हो सकती है, जो भी पब्लिक सर्विस में होते हैं, वो सब लोगों की ख़िदमत करते हैं. पिछले साल-दो साल से हमने जिस तरह से मुल्क में हालात देखे, जम्मू-कश्मीर में देखे. कश्मीर में हत्याओं का एक सिलसिला देखने को मिला.''
''हिंदू-मुस्लिम के बीच बढ़ते अंतर को देखा. रोंगटे खड़े करने वाले वीडियो हमने देखे. गौरक्षा के नाम पर उपद्रव देखने को मिला. ये तो कभी देखने को नहीं मिला था. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश की कोशिशें हमने देखीं. ''
'ऐसे में एक ऑफ़िसर का नौकरी में रहना संभव नहीं था. और समाज के नैतिक सवालों से अलग हो कर रहना और उनपर रिएक्ट नहीं करना, मेरे लिए संभव नहीं था. मैंने चीज़ों पर पहले भी बोला है, लेकिन अब वो वक़्त आ चुका था कि इस खुलकर बोलने की ज़रूरत थी, ये काम नौकरी छोड़कर ही किया जा सकता था.''
''सिविल सर्विस कोड की बात जब होती है, तो उसके मुताबिक़ अभिव्यक्ति की आज़ादी थोड़ी प्रभावित होती है. राजनीति पब्लिक सर्विस का एक्सटेंशन है. अब तक मैं राजनेताओं के साथ काम कर रहा था. ''
''अब ख़ुद पॉलिटिक्स कर सकता हूं, एक्टिविस्ट बन सकता हूं. अवाम की बात करना और अवाम का काम करना, पॉलिटिक्स ये दो चीज़ें मुहैया कराती हैं. मैं सोच रहा हूं कि अगर मुझे मौक़ा मिलता है तो पॉलिटिक्स में जा सकता हूं. ''
क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी में शामिल होने पर विचार
''अभी ये तय नहीं है कि किस पार्टी से जुड़ूँगा. हर पार्टी की अपनी लीगेसी है. अगर कभी पॉलिटिक्स में गया तो उस पार्टी से जुड़ूँगा जो मुझे राज्य के इस मौजूदा हालात पर खुलकर बात करने की आज़ादी देगी. ''
''मैं ऐसी पार्टी का हिस्सा बनना चाहूँगा जिसमें मुझे अल्पसंख्यकों के साथ, कश्मीरियों के साथ हो रही राजनीति को लेकर खुलकर बात करने का मौक़ा मिले. मैं अपने विकल्पों के बारे में सोच रहा हूं और जल्द ही इसपर फ़ैसला करूंगा.''
ये पढ़ेंः कश्मीरी लड़कियों में सिविल सेवा का बढ़ता क्रेज़
''मेरे लिए रीजनल पार्टी में जाना ज़्यादा सही होगा. मैं कश्मीर की बात करना चाहता हूं. हमें समझना होगा कि संसद की मुहर के बिना कोई भी तब्दीली नहीं की जा सकती. मैं संसद में कश्मीरियों की आवाज़ बनना चाहता हूं.''
''कई लोग मुझसे कह रहे हैं कि नई पार्टी बनानी चाहिए लेकिन मुझे लगता है कि अभी राज्य को एकता की ज़रूरत है. जितनी ज़्यादा पार्टियां बनेंगी उतना ही ज़्यादा जनमत विभाजित होगा.''
ये ज़रूरी नहीं कि आप एक नौकरी में 30 साल या 50 साल तक रहें. 10 साल में मुझे आईएएस रहते हुए बेहतरीन अवसर मिले. मैंने संस्थाओं को समझा, लोगों के लिए काम किया, प्रक्रिया समझने का मौक़ा मिला. दुनिया में हर कोई नौकरी बदलता है. मैंने इस लिए ये पद छोड़ा क्योंकि पद पर रहते हुए कई मुद्दों पर बात करना मेरे लिए ठीक नहीं होता.''
''अब तक हमने झूठ की राजनीति देखी है, मैं कुछ छोड़कर राजनीति में आ रहा हूं. मैं अपने आदर्शों को अपने विजन को राजनीति में लाना चाहता हूं अगर ऐसा मौक़ा नहीं मिल पाता है तो राजनीति मेरे लिए आख़िरी पड़ाव नहीं है.''
''साख की बात करूं तो राज्य में अगर मैं राजनीति का हिस्सा नहीं बनूंगा तो कोई और बनेगा, कश्मीर को बेहतर लोगों और नौजवानों की ज़रूरत है. यही सोचकर मैं राजनीति में क़दम रखने की सोच रहा हूं.''
''मौजूदा कश्मीर में लोगों के बीच एक कंफ़्यूजन की स्थिति है. ये बेहद ज़रूरी है कि लोगों में यक़ीन लाया जाए कि ये लोग कश्मीर की बात करेंगे. जबतक मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियां सच नहीं बोलना शरू करेंगी तब तक कश्मीर में उनका भविष्य धुंधला रहेगा.''
Wednesday, January 2, 2019
हिंदू राम मंदिर के लिए अंनत काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता: विहिप
विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि राम मंदिर को लेकर हिंदू समाज अनंत काल तक न्यायालय के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं कर सकता है और भव्य मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ करने के लिए क़ानून बनाया जाना चाहिए.
विहिप की ये प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री के उस बयान के बाद आई है जिसमें नरेंद्र मोदी ने कहा है कि राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश की बात क़ानूनी प्रक्रिया के ख़ात्मे के बाद ही सोची जा सकती है.
समाचार एजेंसी एएनआई को दिए गए एक इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी ने कहा है, "क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने दीजिए. क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सरकार के तौर पर हमारी जो भी ज़िम्मेदारी है, हम उसके लिए पूरी कोशिश करेंगे."
नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार के ख़त्म होने के कुछ ही देर बार आरएसएस के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसाबले ने बयान जारी कर कहा कि जनता सरकार से उम्मीद करती है कि वो राम मंदिर पर किए गए वायदे को अपने इसी कार्यकाल में पूरा करे.
होसाबले ने मंगलवार को जारी लिखित बयान में कहा है कि 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के लिए संविधान के दायरे के भीतर सभी संभावनाओं को तलाशने का वायदा किया था और जनता ने बीजेपी पर भरोसा कर उसे पूर्ण बहुमत दिया इसलिए सरकार को अपने इसी कार्यकाल में इसे पूरा करना चाहिए.
हालांकि आरएसएस के इस बयान में मंदिर निर्माण के लिए क़ानून की बात नहीं की गई है लेकिन संघ प्रमुख ख़ुद और संगठन के दूसरे बड़े अधिकारी सुरेश सोनी अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश या संसद में क़ानून लाने की बात कहते रहे हैं.
आरएसएस के बयान के कुछ घंटो बाद विहिप ने इस मामले पर दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की और क़ानून लाने की बात को फिर से दोहराया.
जब बीबीसी ने विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार से पूछा कि बीजेपी-आरएसएस-विहिप इसी मामले पर अलग-अलग तरह की बातें क्यों कर रहे हैं? क्या ये अयोध्या मुद्दे को गर्म रखने की कोशिश है?
आलोक कुमार ने जवाब में कहा कि नहीं ये कोई लिखित सक्रिप्ट का हिस्सा नहीं है और चूंकि वो राम मंदिर आंदोलन से दशकों से जुड़े रहे हैं तो प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देना लाज़िमी है.
उन्होंने फिर दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई का होना किसी तरह की बाधा नहीं और सरकार को इस मामले पर संसद में क़ानून लाना चाहिए. वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससीएसटी उत्पीड़न क़ानून में बदलाव और फिर संसद में लाये गए क़ानून से जोड़ते हैं और कहते हैं कि जब सरकार उस मामले में ऐसा कर सकती है तो फिर राम मंदिर निर्माण के लिए क्यों नहीं.
हालांकि हिंदूत्ववादी संगठन मोदी सरकार से मंदिर पर क़ानून लाने की बात कह रहे हैं लेकिन संविधान के जानकार पहले भी कह चुके हैं कि पहले तो ऐसा कोई भी विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो पाएगा क्योंकि सरकार को वहां बहुमत नहीं और दूसरे अगर ऐसा हो भी जाता है तो वो सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज हो जाएगा क्योंकि वो संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत होगा.
विहिप का, जो राम मंदिर निर्माण को लेकर कुछ महीनों से आंदोलन चला रही है, दावा है कि अगर सरकार संसद में इस मामले पर बिल लाती है तो कोई भी राजनीतिक दल उसका विरोध करने की स्थिति में नहीं होगा. संगठन इस मामले पर 350 सांसदों ने मिलने का दावा भी करती है हालांकि अलोक कुमार ने उन सदस्यों के नाम बताने से इंकार कर दिया जिन्होंने उनसे राम मंदिर पर क़ानून का समर्थन देने का वादा किया है.
पिछले साल दिसंबर में बीजेपी के सहयोगी दल लोकजनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान ने बयान दिया था कि राम मंदिर एनडीए के एजेंडे का हिस्सा नहीं है. यानी मोदी सरकार में शामिल सभी दल इस मामले पर सरकार के साथ नहीं.
विहिप की ये प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री के उस बयान के बाद आई है जिसमें नरेंद्र मोदी ने कहा है कि राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश की बात क़ानूनी प्रक्रिया के ख़ात्मे के बाद ही सोची जा सकती है.
समाचार एजेंसी एएनआई को दिए गए एक इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी ने कहा है, "क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने दीजिए. क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सरकार के तौर पर हमारी जो भी ज़िम्मेदारी है, हम उसके लिए पूरी कोशिश करेंगे."
नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार के ख़त्म होने के कुछ ही देर बार आरएसएस के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसाबले ने बयान जारी कर कहा कि जनता सरकार से उम्मीद करती है कि वो राम मंदिर पर किए गए वायदे को अपने इसी कार्यकाल में पूरा करे.
होसाबले ने मंगलवार को जारी लिखित बयान में कहा है कि 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के लिए संविधान के दायरे के भीतर सभी संभावनाओं को तलाशने का वायदा किया था और जनता ने बीजेपी पर भरोसा कर उसे पूर्ण बहुमत दिया इसलिए सरकार को अपने इसी कार्यकाल में इसे पूरा करना चाहिए.
हालांकि आरएसएस के इस बयान में मंदिर निर्माण के लिए क़ानून की बात नहीं की गई है लेकिन संघ प्रमुख ख़ुद और संगठन के दूसरे बड़े अधिकारी सुरेश सोनी अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश या संसद में क़ानून लाने की बात कहते रहे हैं.
आरएसएस के बयान के कुछ घंटो बाद विहिप ने इस मामले पर दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की और क़ानून लाने की बात को फिर से दोहराया.
जब बीबीसी ने विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार से पूछा कि बीजेपी-आरएसएस-विहिप इसी मामले पर अलग-अलग तरह की बातें क्यों कर रहे हैं? क्या ये अयोध्या मुद्दे को गर्म रखने की कोशिश है?
आलोक कुमार ने जवाब में कहा कि नहीं ये कोई लिखित सक्रिप्ट का हिस्सा नहीं है और चूंकि वो राम मंदिर आंदोलन से दशकों से जुड़े रहे हैं तो प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देना लाज़िमी है.
उन्होंने फिर दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई का होना किसी तरह की बाधा नहीं और सरकार को इस मामले पर संसद में क़ानून लाना चाहिए. वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससीएसटी उत्पीड़न क़ानून में बदलाव और फिर संसद में लाये गए क़ानून से जोड़ते हैं और कहते हैं कि जब सरकार उस मामले में ऐसा कर सकती है तो फिर राम मंदिर निर्माण के लिए क्यों नहीं.
हालांकि हिंदूत्ववादी संगठन मोदी सरकार से मंदिर पर क़ानून लाने की बात कह रहे हैं लेकिन संविधान के जानकार पहले भी कह चुके हैं कि पहले तो ऐसा कोई भी विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो पाएगा क्योंकि सरकार को वहां बहुमत नहीं और दूसरे अगर ऐसा हो भी जाता है तो वो सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज हो जाएगा क्योंकि वो संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत होगा.
विहिप का, जो राम मंदिर निर्माण को लेकर कुछ महीनों से आंदोलन चला रही है, दावा है कि अगर सरकार संसद में इस मामले पर बिल लाती है तो कोई भी राजनीतिक दल उसका विरोध करने की स्थिति में नहीं होगा. संगठन इस मामले पर 350 सांसदों ने मिलने का दावा भी करती है हालांकि अलोक कुमार ने उन सदस्यों के नाम बताने से इंकार कर दिया जिन्होंने उनसे राम मंदिर पर क़ानून का समर्थन देने का वादा किया है.
पिछले साल दिसंबर में बीजेपी के सहयोगी दल लोकजनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान ने बयान दिया था कि राम मंदिर एनडीए के एजेंडे का हिस्सा नहीं है. यानी मोदी सरकार में शामिल सभी दल इस मामले पर सरकार के साथ नहीं.
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