विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि राम मंदिर को लेकर हिंदू समाज अनंत काल तक न्यायालय के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं कर सकता है और भव्य मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ करने के लिए क़ानून बनाया जाना चाहिए.
विहिप की ये प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री के उस बयान के बाद आई है जिसमें नरेंद्र मोदी ने कहा है कि राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश की बात क़ानूनी प्रक्रिया के ख़ात्मे के बाद ही सोची जा सकती है.
समाचार एजेंसी एएनआई को दिए गए एक इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी ने कहा है, "क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने दीजिए. क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सरकार के तौर पर हमारी जो भी ज़िम्मेदारी है, हम उसके लिए पूरी कोशिश करेंगे."
नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार के ख़त्म होने के कुछ ही देर बार आरएसएस के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसाबले ने बयान जारी कर कहा कि जनता सरकार से उम्मीद करती है कि वो राम मंदिर पर किए गए वायदे को अपने इसी कार्यकाल में पूरा करे.
होसाबले ने मंगलवार को जारी लिखित बयान में कहा है कि 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के लिए संविधान के दायरे के भीतर सभी संभावनाओं को तलाशने का वायदा किया था और जनता ने बीजेपी पर भरोसा कर उसे पूर्ण बहुमत दिया इसलिए सरकार को अपने इसी कार्यकाल में इसे पूरा करना चाहिए.
हालांकि आरएसएस के इस बयान में मंदिर निर्माण के लिए क़ानून की बात नहीं की गई है लेकिन संघ प्रमुख ख़ुद और संगठन के दूसरे बड़े अधिकारी सुरेश सोनी अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश या संसद में क़ानून लाने की बात कहते रहे हैं.
आरएसएस के बयान के कुछ घंटो बाद विहिप ने इस मामले पर दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की और क़ानून लाने की बात को फिर से दोहराया.
जब बीबीसी ने विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार से पूछा कि बीजेपी-आरएसएस-विहिप इसी मामले पर अलग-अलग तरह की बातें क्यों कर रहे हैं? क्या ये अयोध्या मुद्दे को गर्म रखने की कोशिश है?
आलोक कुमार ने जवाब में कहा कि नहीं ये कोई लिखित सक्रिप्ट का हिस्सा नहीं है और चूंकि वो राम मंदिर आंदोलन से दशकों से जुड़े रहे हैं तो प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देना लाज़िमी है.
उन्होंने फिर दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई का होना किसी तरह की बाधा नहीं और सरकार को इस मामले पर संसद में क़ानून लाना चाहिए. वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससीएसटी उत्पीड़न क़ानून में बदलाव और फिर संसद में लाये गए क़ानून से जोड़ते हैं और कहते हैं कि जब सरकार उस मामले में ऐसा कर सकती है तो फिर राम मंदिर निर्माण के लिए क्यों नहीं.
हालांकि हिंदूत्ववादी संगठन मोदी सरकार से मंदिर पर क़ानून लाने की बात कह रहे हैं लेकिन संविधान के जानकार पहले भी कह चुके हैं कि पहले तो ऐसा कोई भी विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो पाएगा क्योंकि सरकार को वहां बहुमत नहीं और दूसरे अगर ऐसा हो भी जाता है तो वो सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज हो जाएगा क्योंकि वो संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत होगा.
विहिप का, जो राम मंदिर निर्माण को लेकर कुछ महीनों से आंदोलन चला रही है, दावा है कि अगर सरकार संसद में इस मामले पर बिल लाती है तो कोई भी राजनीतिक दल उसका विरोध करने की स्थिति में नहीं होगा. संगठन इस मामले पर 350 सांसदों ने मिलने का दावा भी करती है हालांकि अलोक कुमार ने उन सदस्यों के नाम बताने से इंकार कर दिया जिन्होंने उनसे राम मंदिर पर क़ानून का समर्थन देने का वादा किया है.
पिछले साल दिसंबर में बीजेपी के सहयोगी दल लोकजनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान ने बयान दिया था कि राम मंदिर एनडीए के एजेंडे का हिस्सा नहीं है. यानी मोदी सरकार में शामिल सभी दल इस मामले पर सरकार के साथ नहीं.
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